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Monday, July 5, 2010

Netaji ki jay

महंगाई की चिंता मे घुलते राजनेता

मनोज कुमार

महंगाई की आग केन्द्र सरकार की लगायी हुई है तो उसमें घी डालने का काम विपक्षी राजनीतिक दलों ने किया है। महंगाई की मार से जूझते आम आदमी को रोज रोज किलकिल करना पड़ रही है। एक एक खर्चे में कटौती करनी होती है तब कहीं जाकर घर का खर्च चल पाता है। ऐसे में विपक्षी राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में एक पूरा दिन काम धाम चौपट कर दिया। महंगाई का विरोध किया जाना चाहिए किन्तु यह ढंग महंगाई को नियंत्रित करने के बजाय बढ़ाती ही है। मीडिया ने इस बंद के परिप्रेक्ष्य में व्यापक पड़ताल की तो कई जगहों से खबरें आयी कि अनेक घरो में चूल्हे नहीं जले। जले भी तो कहां से? दिहाड़ी मजदूरों को मजदूरी नहीं मिली तो राशन का इंतजाम कहां से हो और जब राशन का इंतजाम नहीं होगा तो चूल्हे कैसे जलेंगे। महंगाई बढ़ाने वाले और उसका विरोध करने वाला कोई नेता यह तो बताये कि उसके घर में कब चूल्हा नहीं जला। एसी कमरे और एसी कार में बैठकर बातें करना आसान है लेकिन रोज रोज मर कर जीते लोगों की तकलीफ का अंदाजा इनमें से किसी को नहीं है। संसद और विधानसभा सरकार नीतियों और कामों की आलोचना करने, विरोध करने के लिये बना है फिर देश का उत्पादन प्रभावित करने की जरूरत क्या और क्यों है? भारी भरकम बजट से चलने वाले इन सदनों में आम आदमी की बात रखने के लिये ही तो जनप्रतिनिधियों का चयन किया जाता है फिर भला उन्हें सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों है। एकबारगी मान भी लें कि ऐसा करके वे सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं तो कोई ये बताये कि किस चीज की कीमत सस्ती हुई है। मैं अर्थशास्त्री तो नहीं हूं लेकिन एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि एक दिन के बंद से जो आर्थिक नुकसान हुआ है, उसकी क्षतिपूर्ति के लिये फिर कीमतों में बढ़ोत्तरी कर दी जाएंगी। विरोध का तरीका यह ठीक नहीं है। जापान में विरोध होता है तो आम आदमी को और अधिक काम करना होता है और हमारे यहां विरोध का मतलब काम ठप करना है। लाखों करोड़ों रुपये राजस्व की जो हानि हुई है, उसे कौन भरेगा। राजनीतिक दलों को आम आदमी की इतनी ही चिंता है तो अपने वेतन भत्ते को लेने से इंकार कर देना चाहिए किन्तु इस मामले में सब दल एक हैं। अभी चर्चा सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने की चल रही है और इस मामले में सब दल एकजुट हैं। दशमल शून्य प्रतिशत राजनेताओं को छोड़ दें तो लगभग सभी नेता मालदार हैं और उन्हें वेतन भत्ते की जरूरत नहीं है। मेरा मानना है कि आम आदमी को इन नेताओं के वेतन भत्ते के खिलाफ रोष जाहिर करना चाहिए। महंगाई की चिंता मे घुलते राजनेता कभी इस पर विचार करेंगे, ऐसे वक्त का देश की जनता को इंतजार रहेगा।

Friday, July 2, 2010

coldrink

कोलड्रिंक्स में अब उफान क्यों नहीं
मनोज कुमार
आज आइसक्रीम पार्लर पर जाकर मैंने कोक की मांग की और सधे हाथों से लगभग छह माह या इससे ज्यादा पहले जो बारह रुपये भुगतान करता था, वह करने लगा तो दुकानदार लगभग मुझे चिढ़ाते हुए कहा कि पन्द्रह रूप्ये लगेंगे। इस बारे में मेरा हर सवाल बेकार था क्योंकि दुकानदार को इससे कोई वास्ता नहीं। इसे संयोग ही कहेंगे कि जब मैं कोक और सुनीता नारायणनन के बारे में सोच रहा था तभी मेरी नजर एक आर्टिकलनुमा खबर पर पढ़ी जिसमें साफ्टडिंªक्स से होेने वाले मानव एवं धरती के नुकसान के बारे में तफसील से बयान किया गया था। यह महज संयोग ही था कि मैं और वह एक किताब एक ही प्लेटफार्म पर खड़े थे। सुनीता नारायणन ने कभी कोलड्रिंक्स में अब उफान पैदा कर दिया था। ठंडे पेय पदार्थ में इतनी गर्मी आ गयी थी कि लोग इसे पीने से परहेज करने लगे थे लेकिन जैसा होता आया है वैसा ही एक बार दोहराया गया और समय गुजरने के साथ साथ यह उफान ठंडा पड़ता गया। लोग भूलने लगे कि इसके पीने से क्या बीमारी होगी और हमारी धरती माता का कोख कैसे आहिस्ता आहिस्ता खोखला होता जा रहा है। एक बार चर्चा इसलिये शुरू हो रही है कि अभी इस विषय पर एक किताब आयी है। बहुत थोड़े से अखबार और पत्रिकाओं ने गौर किया है और इसमें प्रकाशित सामग्री को आम पाठक तक पहुंचाने का प्रयास किया है। तय बात है िकइस सामग्री का बहुत प्रभाव तब तक नहीं पड़ेगा जब तक कि मीडिया आक्रामक न हो जाए। सुनीता नारायणन ने जब मोर्चा खोला था तब मीडिया का तेवर भी आक्रामक था।
समय गुजरने के साथ साथ कोक और पेप्सी का मुद्दा परिदृश्य में चला गया। एक समय था जब मीडिया ने आक्रामक तेवर दिखाये तो इन पेय पदार्थों की कीमतों में अचानक गिरावट आ गयी। कहना न होगा कि कंपनी को उसके लाभ के प्रतिशत में भारी गिरावट दिखी लेकिन नुकसान हुआ होगा, यह कहना मुश्किल है। समय के साथ मामला ठंडा पड़ता गया और इन पेय पदार्थों का बाजार वापस गर्माता गया। चुपके से कब दामों में वृद्वि कर दी गई, किसी को खबर नहीं हुई। इन कंपनियों का फार्मूला बहुत अचूक होता है जब एक रूप्ये कीमत कम करते हैं तो लाखो रूप्ये के विज्ञापन देकर एक एक उपभोक्ता को पकड़ पकड़ कर बताने का प्रयास करते हैं किन्तु जब तीन रूप्ये कीमत बढ़ाते हैं तो किसी को खबर नहीं होने देते। आज इन पेय पदार्थों का मार्केट उछाल पर है और इसे पीने वाले हिन्दुस्तानी की तबीयत उतार पर। पर्यावरण को होने वाले नुकसान की तो पूछिये मत।
सवाल यह है कि एक सुनीता नारायणनन ने सामाजिक सरोकार के मुद्दे को आगे बढ़ाया। सब लोगों ने उनके फेवर में बात की। कहा बिलकुल ठीक है। तो फिर ऐसा क्या हो गया कि इसके बाद आगे कोई क्यों नहीं आया? एकदम से खामोशी क्यों छा गयी? क्यों अब इन पेय पदार्थों से होने वाले नुकसान के बारे में मीडिया फोरम में बातचीत नहीं हो रही है? स्कूलों में बच्चों को जो ताकीद दी जा रही थी, अचानक उस विषय को क्यों गायब कर दिया गया? हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये हम आजादी के साठ साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी लड़ रहे हैं तो पेप्सी और कोक की विदाई करने के लिये हम क्यों पीछे हट रहे हैं? इनके खिलाफ हमारी लड़ाई तेज क्यों नहीं हो रही है। शायद मामला राजस्व का है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की लड़ाई मंे सरकार के खजाने को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है लेकिन इनके खिलाफ कार्यवाही से कुछ तो नुकसान होगा। शराब और तंबाकू पर इसलिये ही अब तक प्रतिबंध नहीं लग पाया है क्योंकि सबसे ज्यादा राजस्व इनसे ही मिलता है। मीडिया को एक बार फिर इस मुद्दे पर आक्रामक होना होगा क्योंकि यह मामला सेहत का है।

Wednesday, June 30, 2010

पोस्ट कार्ड का जन्म दिन

पोस्टकार्ड का जन्मदिन और गुम होते संपादक के नाम पत्र
मनोज कुमार

आज महज संयोग है कि जब मैं संपादक के नाम पत्र और पोस्टकार्ड की महत्ता पर लेख लिखने बैठा तभी पता चला कि आज एक जुलाई को पोस्टकार्ड का न केवल जन्म हुआ था बल्कि उसने अपने जन्म के सौ साल पूरे कर लिये हैं। पोस्टकार्ड हर आदमी के जीवन में बहुत मायने रखता है उसी तरह जिस तरह आज हर जेब के लिये मोबाइल फोन जरूरी हो गया है। इंटरनेट के बिना हमारा काम ही नहीं चलता है और टेलीविजन तो जैसे सांस लेने के लिये जरूरी है। इन आधुनिक तकनीकों के बावजूद पोस्टकार्ड की जरूरत कभी खत्म ही नहीं हुई। इस छोटे से कार्ड को खरीदने के लिये इस महंगाई के दौर में भी मात्र पचास पैसे खर्च करने होते हैं और इस पर कोई बिजली का खर्च नहीं होता है और न ही इसके लिये कोई कम्प्यूटर जैसी चीज की जरूरत होती है। मुझे लगता है कि पत्रकारिता में पोस्टकार्ड एक प्राथमिक कक्षा की तरह ही है जहां भावी पत्रकार अपना पहला सबक सीखते हैं। आइए इस पर थोड़ा विस्तार से बात करें।
अजय शर्मा मेरे दोस्त हैं । इन दिनों एनडीटीवी में समाचार संपादक के पद पर तैनात हैं। अपने आरंभिक दिनों में हम दोनों देशबन्धु के लिये लिखते थे। वे ग्वालियर से खबरें भेजा करते थे और मैं पहले रायपुर और बाद में भोपाल में देशबन्धु मंे बतौर उपसंपादक उन्हें एडिट किया करता था। मैं दैनिक देशबन्धु से भोपाल से निकल रहे साप्ताहिक देशबन्धु में आया था। यहीं हम दोनों की मित्रता हुई। लगभग पन्द्रह बरस से ज्यादा हो गये हमारी पहचान और दोस्ती को। एक दिन मैंने उनसे आग्रह किया कि समागम के लियेे अपनी लिखी पहली खबर की यादों को तफसील से लिखें। उन्होंने मेरे आग्रह को तो माना ही बल्कि जो लिखा, उसने मुझे एकबारगी पत्रकारिता के बरक्स कुछ और सोचने का विषय दे दिया। उन्होंने अपनी यादों में लिखा कि उनके द्वारा लिखा गया संपादक के नाम पत्र कैसे नईदुनिया में प्रकाशित हुआ और उस पत्र के कारण वे अपने शहर में अलग से पहचाने गये। यही नहीं, पत्र में लिखी गयी समस्या का भी तत्काल निदान हो गया। मैंने भी अपने आरंभिक दिनों में संपादक के नाम पत्र लिखा करता था। कभी एक कॉलम में तो कभी दो कॉलम में और कभी बहुत ही संपादित कर प्रकाशित हुआ करता था। इन प्रकाशित पत्रों को सम्हाल कर ऐसे रखते थे मानो किसी बैंक की पासबुक हो। संपादक के नाम पत्र लिखने की आदत बाद के सालों में भी बनी रही और कुछ पत्रिकाआंेे के
लेख/रिपोर्ताज पर अपनी प्रतिक्रिया छपने के लिये भेजता रहा। मजा तो यह था कि पत्रकारिता के कई साल गुजर जाने के बाद भी संपादक के नाम पत्र में अपना छपा नाम देखकर वही आनंद मिलता था, जो पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में मिलता था।
खैर, मुद्दे की बात पर आता हूं। अजय ने जब संपादक के नाम पत्र का उल्लेख किया तो मैं अखबारांे और पत्रिकाओं में तलाश करता रहा लेकिन काफी अध्ययन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अब संपादक के नाम पत्र भेजने में किसी की दिलचस्पी नहीं रही। पाठक अखबारों से लगातार दूर होेते गये और उनकी प्रतिक्रिया के अभाव में पाठक और अखबार के बीच दूरी बनती जा रही है। किसी भी प्रकार का कार्य किया जाए उस पर प्रतिक्रिया आना जरूरी होता है और यही प्रतिक्रिया बताती है कि हम कितने सफल या असफल हैं और समाज हमारे बारे में क्या सोचता है। पत्रकारिता के लिये तो यह और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर हमारे लिखेे का समाज पर क्या असर हो रहा है और लोग हमारी लिखी चीजों को गंभीरता स ेले रहे हैं या नहीं, आदि-इत्यादि बातों का पता चलता है। एक समय था जब प्रतिक्रिया में सैकड़ों की तादात में पत्र आ जाते थे। चूंकि पोस्टकार्ड का आकार छोटा होता है इसलिये इसमें लिखी गयी बातें भी सारगर्भित होती थी। थोड़े शब्दों में अधिक लिखा जाता था। संभवतः मेरे समकालीन पत्रकारों को ज्ञात होगा कि संपादक के नाम पत्र में छपी समस्या अथवा किसी मुद्दे को उभारे जाने पर शासन प्रशासन में न केवल प्रतिक्रिया होती थी। अजय शर्मा का संपादक के नाम लिखे गये पत्र में उन्होंने इसी किस्म की बात को याद किया है।
आधुनिक समय में समय और स्थान की कमी होती जा रही है तब पोस्टकार्ड और भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह केवल प्रतिक्रिया लिखने के लिये नहीं बल्कि उन नवोदित पत्रकारों को यह सीखने के लिये कि एक छोटे से पोस्टकार्ड में हम अपनी बात कितने प्रभावी ढंग से लिख सकते हैं। मैं जब कभी मीडिया के विद्यार्थियों के बीच जाता हूं तो पोस्टकार्ड ले जाना नहीं भूलता। उन्हें इसे पत्रकारिता की प्राथमिक कक्षा के रूप् में संबोधित करते हुए इसके महत्व को बताता हंू। ई-मेल और मोबाइल के जरिये बात हो रही है, एक्शन-रिएक्शन लिये दिये जा रहे हैं लेकिन इनका दस्तावेजीकरण नहीं हो पा रहा है। पोस्टकार्ड एक प्रकार का दस्तावेज हुआ करता था। पोस्टकार्ड के लिये बिजली की भी जरूरत नहीं है। एक रुपये के पेन से भी काम चल जाता है। आज पोस्टकार्ड के जन्मदिन पर पत्रकारिता में इसके महत्व को आंकने की जरूरत है।

मीडिया और महिलाये


लीडरशीप की नयी परिभाषा गढ़ती ग्रामीण महिलाएं

मनोज कुमार

ध्यप्रदेश में पंचायतीराज के डेढ़ दशक बाद महिला लीडर अब पूरी तरह से चुनौतियों का सामना करने के लिये तैयार दिख रही है। अनेक किस्म की दिक्कतों के बीच वे अपने लिये राह बना रही हैं। सत्ता पाने के बाद उन्हें सरूर (सत्ता का नशा) नहीं हुआ बल्कि सत्ता से वे सत (सच) का रास्ता बना रही हैं। यह स्थिति राज्य के दूरदराज झाबुआ से लेकर मंडला तक के ग्राम पंचायतों में है तो राजधानी भोपाल के आसपास स्थित गांवों की महिला लीडरों का काम अद्भुत है। ये महिलाएं कभी चुनौतियों को देखकर घबरा जाती थीं तो अब चुनौतियों का सामना करने के लिये ये तैयार दिख रही हैं। पंचायतीराज का पूरा का पूरा परिदृश्य बदला बदला दिखायी देने लगा है। कभी गांवों में महिलाओं के नाम पर पुरूषों की सत्ता हुआ करती थी और परिवार वालों का दखल था, अब वहां सिर्फ और सिर्फ महिलाआंे का राज है। वे चुनी जाती हैं, राज करती हैं और समस्याआंे से जूझती हुई गांव के विकास का रास्ता तय करती हैं। किरण बाई आदिवासी महिला है। वह तेंदूखेड़ा में रहती है। इस बार के चुनाव में वह बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष चुनी गयीं। तेंदूखेड़ा और बाबई चिचली के बीच की दूरी लगभग तेरह किलोमीटर है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते उन्हें नियमानुसार वाहन की सुविधा मिलनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते किरण बाई ने जनपद पंचायत के सीईओ से इसी साल 2010 के अप्रेल महीने में वाहन देने का अनुरोध किया तो उन्हें किराये पर वाहन लेने की अनुमति दी गई। किरण बाई को लगा कि उनकी मुसीबत खत्म हो गई और वे अपने काम को इत्मीनान के साथ पूरा कर सकेंगी लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि अभी उनकी मुसीबत खत्म नहींं हुई है। सीईओ के आदेश पर वाहन किराये पर लिया और अपना काम निपटाने निकल पड़ी। महीना खत्म होते होते जब किरणबाई ने भुगतान के लिये बिल प्रस्तुत किया तो उसे किनारे कर दिया गया और कहा गया कि अभी राशि नहीं है। जनपद अध्यक्ष के लिये अब दोहरी मुसीबत है। पहले तो गाड़ी नहीं थी, अब उधारी उनके मत्थे चढ़ गयी है। सीईओ कहते हैं कि उनके पास ही गाड़ी नहीं है तो जनपद अध्यक्ष को कहां से गाड़ी की सुविधा दें लेकिन पंचायत कानून में साफतौर पर प्रावधान है कि जनपद अध्यक्ष को वाहन सुविधा उपलब्ध करायी जाए। बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष किरण बाई के हौसले को सीईओ की इस बेरूखी से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपने पति के साथ रोज तेरह किलोमीटर का सफर सायकल से तय कर जनपद मुख्यालय जाती हैं। दिन भर काम निपटाने के बाद वह वापस अपने पति के साथ घर लौट आती हैं। अपने जीवनसाथी के इस सहयोग से जहां किरण बाई के हौसलों को नयी ऊंचाई मिली है। किरणबाई एक मिसाल है उन महिलाओं के लिये जो सुविधाओं के अभाव में अपना काम नहीं कर पाती हैं या दिक्कतों का रोना रोते हुए समय गंवा देती हैं। किरणबाई सुविधा नहीं मिलने से दुखी हैं लेकिन निराश नहीं। वे अपना दायित्व समझती हैं और उसे पूरा करने के लिये आगे आ रही हैं। किरणबाई राज्य की पंचायतों की अकेली लीडर नहीं है बल्कि ऐसे अनेक गुमनाम महिला लीडर हैं जो इसी साहस और ताकत के साथ सत्ता की बागडोर सम्हाले हुए हैं। इन महिला लीडरों को समाज सलाम करता है। मध्यप्रदेश में स्त्री ग्रामीण सत्ता के प्रति पुरूषों में भी भाव बदला है। अब उन्हांेंने किनारा कर लिया है और इसका प्रमाण यह है कि राज्य के अनेक पंचायतों में सौफीसदी सत्ता महिलाओं की बन गयी है। पचास फीसदी आरक्षण के कारण और पचास फीसदी स्वयं पुरूषों द्वारा सत्ता छोड़ने के कारण। हालांकि अभी इसका प्रतिशत कम है लेकिन उम्मीद की एक किरण जागी है। महिला लीडरों के लिये चुनौतियां कम नहीं हुई है। अनेक ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां पंचायतोंे में महिला लीडरों को उनके बुनियादी अधिकार एवं सुविधाओं से वंचित रखा गया है। नियमों का हवाला, आर्थिक तंगी और अपरोक्ष रूप महिला लीडर को परेशान करने की मंशा के चलते रोज नयी चुनौतियां दी जा रही हैं। इन चुनौतियों से महिला लीडर परेशान होने के बजाय रोज नयी इबारत लिख रही हैं।

Saturday, June 26, 2010

paetish saal bad

कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हम
मनोज कुमार
पैंतीस बरस बाद जब हम भारतीय इतिहास के आपातकाल के उन दिनों को याद करते हैं तो मन एक बार फिर कसैला हो जाता है किन्तु साथ ही गर्व करते हैं कि तत्कालीन सरकार के इस तानाशाही रवैये का हिन्दी पत्रकारिता ने पुरजोर विरोध किया था। जैसा कि होता है आपातकाल के दरम्यान सबसे पहला प्रहार पत्रकारिता पर ही हुआ था। अखबारों के दफ्तरों में पहरा बिठा दिया गया था। अखबार छपने के पहले सरकारी नुमाइंदे उसे पढ़ते, जांचते और फिर छपने के लिये दिया जाता था। अखबारों की यह मजबूरी थी किन्तु इस मजबूरी के चलते हथियार नहीं डाला गया बल्कि पूरी ताकत के साथ लड़ा गया। यह वह समय था जब अखबारों की तादाद कम थी लेकिन जो भी थे, प्रभावशाली। एक एक शब्द हथौड़ी की तरह चोट कर जाता था। समाज अखबार में छपी खबरों को गंभीरता से लेता था। समय गुजरता गया। साल दर साल आपातकाल की बात पुरानी होती गयी। नयी पीढ़ी को तो बहुत कुछ पता ही नहीं। इस बीच पत्रकारिता से मीडिया का स्वरूप बन गया और वह दिन ब दिन विस्तार पा रहा है। आकाशीय चैनलों की धूम है और अखबारों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है।
खैर, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है कि पत्रकारिता इतिहास रचती है। आपातकाल का पुरजोर विरोध कर पत्रकारिता ने यह जता दिया था। जिस पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर किया था, उसमें इतनी ताकत बची है कि वह बार बार और हर बार ऐसे तानशाह को मुंहतोड़ जवाब दिया। इस बार जब आपातकाल के पैंतीस बरस हुए तो अखबारों में विशेष सामग्री दी गई। यह एक कोशिश थी जिसे अच्छा ही कहा जाएगा। इतिहास से बेखबर पीढ़ी को आपातकाल के बारे में जानने और समझने का अवसर मिला है। आपातकाल की जो गूंज थी, इन पैंतीस सालों में वह धीमी पड़ गयी है तो पत्रकारिता के तेवर भी बदले हुए हैं। पैंतीस बरस पहले शायद पत्रकारिता को लेकर कभी कोई सवाल या संशय की स्थिति नहीं बनी। अखबार यानि सच और सच का मतलब सिर्फ सच हुआ करता था किन्तु इन सालों में इस सच का मतलब बदलता हुआ दिख रहा है। समाज का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर कभी आंच नहीं आयी और ऐसा होता तो शायद न कभी अंग्रेज भारत छोड़ कर जा पाते और न ही आपातकाल का अंत हो पाता लेकिन आज ऐसा हो रहा है।
पत्रकारिता को लेकर सवाल पर सवाल दागे जा रहे हैं। पत्रकारिता की वि·ासनीयता कटघरे में है। अवि·ाास के इस दौर में पत्रकारिता को विस्तार भी मिला है किन्तु एक उत्पाद के रूप में। पैंतीस बरस पहले भी अखबार व्यवसायिक थे और इसके लिये एक पन्ना तय होता था जिसमें व्यापार की खबरें छपा करती थी किन्तु अब एकाध पन्ने को छोड़कर पूरा अखबार व्यापार करने लगा है और इसी के साथ खबरों की वि·ासनीयता घटने लगी है। कंटेंट को लेकर अब अखबारों में कोई चिंता नहीं दिखती है बल्कि कलेवर को लेकर चिंता ज्यादा है। सामाजिक सरोकार की खबरें हाशिये पर है और लाइफस्टाइ, फैशन के लिये पूरा पूरा पन्ना छापा जा रहा है। पैंतीस साल के इस सफर में हिन्दी पत्रकारिता की उपलब्धि यह रही कि अंग्रेजी के अखबारों और पत्रिकाओं को हिन्दी में आना पड़ा लेकिन यह उपलब्धि सही मायने में बाजार की मानी जानी चाहिए क्योंकि हिन्दी का बाजार बड़ा है। इस बात को अंग्रेजी प्रबंधन ने खूब जाना और वे हिन्दी पर अहसान थोपते हुए हिन्दी बाजार में आ गये। अपने आने के साथ साथ वे पत्रकारिता के साथ बाजार का व्यवहार करने लगे। अखबारों में उपहारों की बरसात होने लगी। बस वैसे ही जैसे बाजार में उपलब्ध अन्य उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिये कोई कारोबारी करता है। उपहार स्कीम ने भी अखबारों की प्रतिष्ठा एवं प्रभाव को कम किया है क्योंकि जिन अखबारों को उसके कंटेंट के लिये सम्हाल कर रखा जाता था, आज वही अखबार सहेजे जा रहे हैं उपहार पाने के लिये कूपन बटोरेने के खातिर।
इन सालों में हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार होता गया। हर बड़े कारोबारी घराने को यह सुहाने लगा कि वह भी अपना एक अखबार या पत्रिका निकाल ले। कुछ इस कोशिश में सफल भी हुए तो अधिकांश केवल ढो रहे हैं। अखबारों के नाम भी विचित्र से रखे जाने लगे हैं। कुछ सुझा नहीं तो अपनी ही संस्था के नाम के आगे पीछे कुछ जोड़जाड़ कर आरंभ कर दिया। मोटी तनख्वाह देकर कुछ दक्ष पत्रकारों को साथ ले लिया और बाकि का स्टाफ नौसिखियों से भर लिया गया। कंटेंट का तो इन अखबारों में कोई सवाल ही नहीं था। साधन की कमी नहीं थी सो कारोबारियों के अखबार साध्य में लग गये। राजनीति और प्रशासन में अखबार के जरिये पहुंच और पकड़ बनाने लगे। जिन्हें कभी अपने कारोबार के काम को सहज बनाने के लिये भेंट देना होती थी, उसमें उन्हें पूरी तरह छूट या रियायत मिलने लगी। उनके अखबार निकालने का मकसद यही था और यह पूरा होने लगा।
आपातकाल में अखबार कहर ढा रहे थे, आज वही अखबारों पेडन्यूज के मामले में विवादों के घेरे में है। जांच चल रही है, बातें हो रही है, चेतावनी मिल रही है और नजरें भी रखी जा रही हैं। कितने दुर्भाग्य की बात कि कल जो पत्रकारिता समाज के विरोधियों पर नजरें रखती थी, आज उस पर दूसरों की नजरें हैं। पैसे लेकर खबर छापने के कारण पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर भी आंच आयी है। पैंतीस बरस बाद इतिहास के काले पन्ने को याद कर हम सिहर उठते हैं लेकिन आज जो पत्रकारिता के हालात हैं, वह भी सिहरन पैदा करती है। इन पैंतीस सालों में हिन्दी पत्रकारिता में सम्पादक नाम की संस्था का लोप होता जा रहा है। मालिक स्वयं सम्पादक बन बैठे हैं और कानूनी बाध्यता झेलने के लिये एक कार्यकारी सम्पादक बिठा दिया जाता है। यह बदलाव भी पीड़ादायक है।
इन पैंतीस सालों में मंझोले किस्म के कस्बाई अखबार जरूर उम्मीद की रोशनी जगाते हैं। बड़े समाचार समूहों के मल्टीएडीशन अखबारों के चलते एक शहर की खबर दूसरे शहर में नहीं पहुंच पा रही है किन्तु सीमित संसाधनों में निकलने वाले अखबार इस कमी को पूरा कर रहे हैं। उनके पास आम आदमी की पीड़ा छापने के लिये अभी जगह बाकि है क्योंकि उन्हें मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। पैंतीस बरस की हिन्दी पत्रकारिता नाउम्मीद ही करती है। हालांकि इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता में घटाघोप अंधेरा छा गया है।

Thursday, June 24, 2010

aapatkal

यादें आपातकाल की और पत्रकारिता के विद्यार्थी
मनोज कुमार

आज अखबारों को देखकर अच्छा लगा कि लगभग सारे अखबारों ने किसी न किसी रूप में आपातकाल को याद किया है। आपातकाल भारतीय इतिहास का एक काला पन्ना है और इसके बारे में जानना सबके लिये बहुत जरूरी है। अखबारों में इस विषय पर प्रकाशित लेख और टिप्पणियों से पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी को समझने और सीखने का अवसर मिलेगा। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ जब मैं रूबरू होता हूं तो मुझे यह जानकर हैरानी होती है िकवे अपने ही देश के इतिहास से नावाकिफ हैं। आपातकाल के बारे में उनकी जानकारी शून्य है। उन्हें यह तो पता ही नहीं है कि देश में आपातकाल किस सन में लगा था। आपातकाल किसने लगाया था और क्यों लगा था, इसके बारे में जानकारी का तो कोई सवाल ही नहीं था। कदाचित कुछ विद्यार्थियों को आपातकाल क्या होता है, यह भी शायद पता नहीं होगा, किन्तु इसका खुलासा नहीं हो पाया। थोड़े से विद्यार्थी ऐसे भी थे जिन्हें अपने इतिहास की जानकारी थी, किन्तु उनका प्रतिशत बेहद कम है। अजानकारी की यह स्थिति एक सेमेस्टर के विद्यार्थियों की नहीं है बल्कि यह समस्या लगातार बनी हुई है। यह पत्रकारिता के लिये घातक है। जो विद्यार्थी अखबार और टेलीविजन की कमान सम्हालने आये हैं, जो कल के पत्रकार होंगे उनके लिये तो यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपने बीते हुए कल को जानें। उनकी जानकारी इसलिये भी पुख्ता होना चाहिए क्योंकि उनकी जानकारी से समाज शिक्षित होता है। मीडिया की प्राथमिक जिम्मेदारी तीन खंडों में बांटी गयी है जिसमें समाज को सूचना देना, शिक्षित करना और उनका मनोरंजन करना है। ऐसे में वर्तमान में काम कर रहे पत्रकार हों या इस विधा में पारंगत हो रही नवागत पीढ़ी, उन्हें आपातकाल जैसे हर बड़े और जरूरी घटनाक्रम के बारे में विस्तार से जानना चाहिए। यही नहीं, इन घटनाक्रम के बाद देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में हुए बदलाव के बारे में अधिकाधिक जानना चाहिए। पत्रकारिता में बीता हुआ कल बहुत मायने रखता है। आज की स्थिति को बताने के लिये अथवा तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये बीते हुए कल को जानना बेहद जरूरी होता है। यह जाने बगैर कि कल भारत की स्थिति क्या थी, आज के भारत के विकास की मीमांसा करना लगभग मुश्किल है और जो किया जाता है, वह सतही है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये आज का अखबार बेहद महत्वपूर्ण है। भोपाल के अखबारों ने अपनी अपनी तरह से आपातकाल की व्याख्या की है और आज के संदर्भ में कुछ नये तथ्यों और नई समस्याओं पर रोशनी डाली है। नईदुनिया ने आपताकाल को याद करते हुए राजेन्द्र माथुर के आलेख को प्रकाशित किया है। नईदुनिया ने आपातकाल के विरोध में सम्पादकीय हिस्से को रिक्त छोड़ दिया था। यह विरोध का अनोखा तरीका था जिसे आज की भाषा में गांधीगिरी कहा जा सकता है। इतिहास को जानने और इसे संग्रह करने के लिये पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये बेहतर अवसर है। वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक श्रवण गर्ग ने आपातकाल को याद करते हुए भास्कर के पहले पन्ने पर बेहद ज्वलंत मुद्दे को रेखांकित किया है। खाप पंचायतों के बारे में उनकी टिप्पणी सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता का आइना है। आपातकाल के साथ साथ आज की परिस्थिति का विश्लेषण पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये लगभग एक पाठ है और जिसे हर विद्यार्थी को पढ़ा जाना चाहिए। पत्रिका और अन्य अखबारों ने भी आपातकाल और वर्तमान स्थिति की तुलना करते हुए काफी कुछ लिखा है।
अभी हाल ही में भोपाल गैस त्रासदी को लेकर भी अखबारों ने जो विशेष सामग्री प्रकाशित की है, वह पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिये पठनीय एवं संदर्भ सामग्री के रूप् में संग्रहणीय है। एक अच्छे पत्रकार के पास संदर्भ सामग्री का जखीरा होना चाहिए जिसे वह समय समय पर उपयोग कर सके। संदर्भ सामग्री के अभाव में अधूरी और अपुष्ट जानकारी दी जाती है जिससे न केवल पत्रकार की प्रतिभा प्रभावित होती है बल्कि उसकी विश्वसनीयता भी। पुस्तकालय से दूर होते विद्यार्थियों को वापस पुस्तकालय की ओर लौटने की जरूरत है और तब तक प्रतिदिन के अखबारों में समसामयिक विषयों पर प्रकाशित होने वाली सामग्री के संग्रहण और संचयन की प्रवृत्ति डाल लेनी चाहिए। (फोटो गूगल से साभार)

Media ka Roal


गैस त्रासदी और मीडिया
मनोज कुमार

पच्चीस बरस पहले दो-तीन दिसम्बर की दरम्यानी रात जब मिथाइल आयोसायनाइट ने भोपाल में तबाही मचायी थी तब और आज के भोपाल का चेहरा बदल गया है। बदलाव तो तबाही के थोड़े सालोें बाद ही शुरू हो गया था लेकिन आज पच्चीस बरस बाद तो सबकुछ बदल गया है। पच्चीस बरस बाद जब अदालत ने तबाही के गुनहगारों को फैसला सुनाया तो इसकी गूंज पूरी दुनिया में हुई। एक-दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में फंसी मीडिया एकाएक आक्रामक हो गयी। पच्चीस बरस पहले भोपाल में जब यह तबाही मची थी तब अखबारों ने बेहद संजीदा होकर मामले को दुनिया के सामने रखा था। इस बार भी वह संजीदा थी लेकिन उसे साथ ही ज्यादा लोकप्रिय हो जाने की जल्दबाजी थी। जल्दबाजी यह भी थी कि उसका प्रतिस्पर्धी अखबार कहीं आगे न निकल जाए। पच्चीस बरस पहले यह प्रतिस्पर्धा नहीं थी। अखबारों की इस प्रतिस्पर्धा से कुछ बातें अच्छी हुई तो कुछ अखरने वाली भी रही। सामाजिक सरोकार के मामले में अखबारों की भूमिका को निरपेक्ष भाव से देखना होगा।
पच्चीस बरस पहले अखबार भोपाल के अवाम के साथ थे और पच्चीस बरस बाद भी अखबार अवाम के साथ खड़े दिखे। उनके हक में बात करते रहे। अखबार भोपाल की अवाम के साथ तो थे किन्तु उनकी प्राथमिकता बदली हुई थी। इस पर बात आगे फिलहाल कुछ और बातें इसी से जुड़ी हुई। अखबारों ने परिशिष्ट पर परिशिष्ट ठोंक दिये। फैसले के बाद लगातार कई दिनों तक दो और अधिक पन्ने गैस त्रासदी के नाम कर दिये। कोई किसी से पीछे न रह जाए इसलिये अलग से पन्ने दिये गये तो दैनंदिनी पन्नों में भी कटौती कर गैस से जुड़ी खबरों, रिपोर्ट्स और आलेखों को प्राथमिकता दी गई। उस रात की भयानक मंजर को याद किया गया। अखबारों की इस कोशिश का लाभ यह हुआ कि कई कई अनाम सी जानकारी आम आदमी तक आयी। पच्चीस बरस में जवान हो चुकी नयी पीढ़ी जो इस दर्द से अनजान थी, उसे जानने और समझने का मौका मिला। वह दर्द को महसूस तो नहीे कर पायी होगी लेकिन दर्द को जानने का अवसर जरूर मिला। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच दर्द का रिश्ता बन चला।
अखबारों ने पूरी शिद्दत के साथ गैस त्रासदी से जुड़े मुद्दे को उठाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी । तब के भोपाल में एसपी रहे रिटायर्ड स्वराज पुरी को अपने वर्तमान पद से इस्तीफा देना पड़ा। यहां कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति अथवा नैतिकता ने काम नहीं किया बल्कि अखबारों की प्रभावशाली भूमिका उनसे यह काम करा गयी। अखबारों ने खबरों और बातचीत के जरिये उन अफसरों के मन को तलाशा जो उस समय के जिम्मेदार माने गये हालांकि सबने कहा हम जिम्मेदार नहीं। ऐसे में अखबारों ने उनसे सुन ही लिया जिनमें तत्कालीन डीएम कहते हैं छोड़िये इन बातों को, बनारस की बात कीजिये। आम आदमी के सामने उनकी सोच अखबार के कारण ही आम आदमी तक पहुंच गयी। ऐसे अनेक जुड़े लोगों को बेनकाब करने में अखबार शक्तिशाली साबित हुए। दरअसल यही, अखबार का काम है और अखबारों ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। पच्चीस बरस पहले के अखबारों की भूमिका और आज के अखबारों की भूमिका का थोड़ा फर्क भी जांच लें। जहां तक मेरी जानकारी है तीन दिसम्बर को अखबार छपा ही नहीं था। अगले दिन जब अखबार छपे तो ऐसा लग रहा था कि अखबार के कागज आंसुओं में डूब गये हैं। आहिस्ता आहिस्ता गैस की खबरें, पीड़ितांे का दर्द अखबारों के कोने में जाता रहा। दो तीन बरस बीतते बीतते गैस त्रासदी पर ही खबरें बनती रहीं और पिछले एक दशक से ज्यादा समय से तो यह बरसी भी औपचारिक हो गयी थी। पच्चीस बरस बाद अखबार एकदम जागे। अदालत के फैसले ने न केवल भोपाल को बल्कि पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। विश्व स्तर पर इसकी प्रतिक्रिया हुई थी। फैसले को हर स्तर पर कोसा गया था। अखबारों ने फैसले की समीक्षा की और यह तलाश करने का प्रयास किया कि दोषी कौन है और सजा किसे मिलनी चाहिए। अपरोक्ष रूप से अखबार भी किसी न किसी के पक्षकार बन गये। यह सुनियोजित नहीं था लेकिन हुआ तो यही। तत्कालीन कांग्रेस सरकार, मुख्यमंत्री, अफसरान को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई। अखबारों की इस रिपोर्टिंेग, लेख और साक्षात्कार गैस पीड़ितांे के दर्द से परे होकर राजनीतिक हमले पर केन्द्रीत हो गया। एक बार फिर वही होने लगा जो पहले होता रहा है मूल मुद्दा हवा में गुम हो गया और राजनीति छा गयी। अच्छा तो यह भी लगा कि मुआवजे की घोषणा के साथ बाजार की तैयारियों को भी खबरों में जगह दी गई। जाहिर है मुआवजे का पुराना अनुभव बाजार को है और बाजार को उम्मीद है कि इस बार फिर बाजार में ही मुआवजे की राशि अलग अलग सूरत में लौट आएगी। अखबारों के पच्चीस साल बाद की रिपोर्टिंेग में राहत के नाम पर मुआवजा का मुद्दा उठा। अलग अलग अखबारों में अलग अलग आंकड़े छपे लेकिन लगभग सबने कहा यह मुआवजा हमारी वजह से लेकिन कोई यह बताने वाला नहीं कि आखिर उनका दावा क्या था। यह मीडिया की प्रवृत्ति का द्योतक थी। आगे निकल जाने की होड़ में। इस सिलसिले में मुझे याद आता है कि हमें सिखाया जाता था कि किसी दुघर्टना में किसी की मौत दर्दनाक होती है किन्तु एक अखबारनवीस संवेदनशील होने के साथ बेरहम भी होता है। रिपोर्टर तो संवेदनशील होता है लेकिन अखबार का व्यवसाय उसे बेरहम बनाता है। जब कोई बड़ी दुघर्टना होती है तो अखबार की डेडलाइन के साथ हम यह देखते हैं कि मरने वालों की संख्या क्या हुई। हमारे प्रतिद्वंदी अखबार के आंकड़े से कम से कम दो तो हमारे ज्यादा हांे। झूठे आंकड़ें दे नहीं सकते और सच जानने के लिये किसी के जाने का इंतजार करना होता है। कुछ ऐसा ही भूमिका हर घटना दुघर्टना में अखबार की, रिपोर्टर की होती है, वह हुई। राहत के लिये मुआवजे की मिली रकम को अखबारांे ने नाकाफी बताया लेकिन बावजूद इसके वह यह दावा करने से नहीं चूके कि यह फैसला उनके कारण ही आया। व्यवसायिकता के इस दौर में यह अनपेक्षित नहीं है। हालांकि जब किसी की भूमिका का आप आंकलन करते हैं तो आपको उसके सकरात्मक और नकरात्मक दोनों पक्षों को तटस्थता के साथ देखना होता है। गैस त्रासदी के बारे में अखबारों की भूमिका पर भी यह केमिस्ट्री काम करती है। अखबारों ने पच्चीस बरस बाद भी पूरी शिद्दत के साथ भोपाल के अवाम के साथ खड़े दिखे, अच्छा लगा किन्तु प्रभावितों के इलाज को लेकर हो रही लापरवाही, भ्रष्टाचार और अनदेखी को भी उसी ताकत के साथ उठाते तो राहत के नये रास्ते खुल जाते। मुआवजा प्रभावितों को थोड़े समय के लिये राहत दे जाएगा किन्तु उनकी तकलीफ को पैसा नहीं दवा ही दूर कर पाएगी। इसके लिये अभी भी अखबारों से अपेक्षा है िकवह केम्पेन चलाये ताकि दुआ ही नहीं, प्रभावितों को दवा भी मिल सके।