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Wednesday, July 7, 2010

samriti sha

स्मृति शेष : वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री

समझौता जिन्हें कभी मंजूर न था


-मनोज कुमार

आम दिनों की तरह आज भी अखबार समय पर आ गया था। रोज की तरह कुछ अलग किस्म की खबरें देख लेने की लालसा थी किन्तु आज का अखबार एक ऐसी खबर लेकर आएगा जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। लगभग हर अखबार के पहले पन्ने पर, किसी में सिंगल कॉलम की खबर तो किसी में बड़ी खबर पत्रकारिता के दिग्गज हस्ती रामशंकर अग्निहोत्री के नहीं रहने की थी। वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री हमारे बीच नहीं रहे, यह कहना और सुनना भला नहीं लगता है लेकिन सच से भला कौन मुंह मोड़ सकता है। सच तो यही है कि वे हमारे बीच नहीं रहे। इस सच के बाद भी एक सच यह है कि अपने सम्पूर्ण संघर्षमय जीवन में उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अपनी शर्ताें पर जीते रहे और शिखर पर बैठे रहे। संघर्ष के बाद भी समझौता नहीं कर पाना अग्निहोत्रीजी जैसे लोगों के बूते की बात होती है। वे उन थोड़े से लोगों में हैं जो समाज के लिये आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वे समाज को, खासतौर पर पत्रकारिता बिरादरी से संबंद्व नौजवानों को यह संदेश दे गये हैं कि निरपेक्ष भाव से काम करते रहें क्योंकि पत्रकारिता मांगती नहीं, देती है। मध्यप्रदेश के एक छोटी सी कस्बानुमा स्थान है सिवनी मालवा। सिवनीमालवा अपरिचित नहीं है। यह वह स्थान है जिसके पास में बसा है आज का माखननगर और पुराना बाबई। बाबई में पत्रकारिता के दिग्गज पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने जन्म लिया था और इसी पुण्यसलिला नर्मदा की नगरी के पास बसे सिवनी मालवा में अग्निहोत्री जी का जन्म हुआ। यहीं दैदिप्यमान पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री ने आज से ८१ बरस पहले वर्ष १९२६ के १४ अप्रेल को जन्म लिया।
पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी वरिष्ठ पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री ही नहीं, उनके समकालीन लोगों से अपरिचित होगी, इस बात पर हैरानी नहीं होती है। पत्रकारिता की नवागत पीढ़ी में अध्ययन और संवाद की कमी लगातार बढ़ रही है और यही कारण है कि पत्रकारिता के मील के पत्थर के रूप में स्थापित लोगों के बारे में उनका ज्ञान शून्य है। मैं भी कुछ वर्ष पहले तक केवल उनके बारे में पढ़ा और सुना था किन्तु भाई डॉ. सुरेन्द्र पाठक के जरिये उनसे परिचय हुआ। जब मैं उनसे मिलने पहुंचा था तो मन में यह बात थी कि वे जनसंघ के विचारों से हैं और पता नहीं पत्रकारिता में उनकी दृष्टि और सोच क्या होगी किन्तु मुलाकात होते ही मेरी सोच एकदम से बदल गयी। वे जनसंघ के विचारों के प्रणेता तो थे किन्तु इससे आगे वे प्रतिबद्व पत्रकार थे। उनका कमिटमेंट पत्रकारिता के प्रति था। उनका यह दूसरा पक्ष मैंने उनसे मिलने के बाद जाना और इसके बाद की मुलाकात मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उन्हें अखिल भारतीय माणिकचंद्र वाजपेयी सम्मान से सम्मानित किये जाने के समय हुई। इस दरम्यान बहुत थोड़े समय के लिये या यूं कहिये कि यह मुलाकात कुछ पल के लिये थी। लगभग अस्सी बरस के उम्रदराज पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री का शरीर समय के साथ भले ही कमजोर दिखने लगा था किन्तु ओज और तेजस्विता उनके चेहरे पर आज भी कायम थी। मेरी इस आखिरी मुलाकात में उन्होंने पत्रकारिता के संदर्भ में एक वाक्य बोल गये थे कि नौजवान हो, अभी काफी काम करना है। ध्यान रहे कि पत्रकारिता हमेशा निरपेक्ष हो क्योंकि पत्रकारिता समाज का दर्पण है और दर्पण की अपनी जवाबदारी होती है।

डॉक्टर हरिसिंह गौर वि·ाविद्यालय सागर से स्नातक होने के बाद १९५२ में नागपुर से पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा हासिल की। पत्रकारिता में डिप्लोमा प्राप्त करने के बाद वे राष्ट्रवादी पत्रकारिता के पुरोधा के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। यह वह दौर था जब देश को आजादी मिली ही थी और पत्रकारिता विदेशी विचारधारा की अनुगामी बन रही थी। यहीं से उनके संघर्ष का दौर आरंभ होता है। पराधीन भारत की राष्ट्रवादी पत्रकारिता स्वतंत्र भारत में गुमनाम हो रही थी और ऐसे कठिन समय में सामने आने की हिम्मत रामशंकर अग्निहोत्री ने दिखायी। उन्होंने पांचजन्य के मध्यभारत संस्करण के बाद पांचजन्य के संपादक का दायित्व भी सम्हाला। मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म, प्रसंग लेख सेवा युगवार्ता और हिन्दुस्तान समाचार के संपादक का दायित्व भी निभाया। संपादक के रूप में दिल्ली से प्रकाशित सांध्य दैनिक आकाशवाणी का कार्यभार भी सम्हाला। वे देश के चुनिंदा पत्रकारों में शामिल रहे जिन्होंने युद्ध क्षेत्र की रिपोर्टिग की। वे हिन्दुस्तान समाचार न्यूज एजेंसी के पश्चिम क्षेत्र युद्ध संवाददाता भी रहे। पराधीन भारत की पत्रकारिता के बाद एक बार देश में फिर से पराधीनता का दौर देखा वर्ष १९७५ में जिसे भारतीय इतिहास आपातकाल के नाम से जानता है। इस दौर में पत्रकारिता करना शायद पराधीनता के समय से भी ज्यादा कठिन था। इस कठिन वक्त में अग्निहोत्रीजी ने एकीकृत समाचार न्यूज एजेंसी में उपसंपादक के रूप में कार्य किया। कहना न होगा कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता को इस दौर में उन्होंने नये रूप में परिभाषित कर हिन्दुस्तानियों में उनके आत्मसम्मान को जागृत किया। अनेक देशों की यात्राएं की और वहां के अनुभवों को अपनी लेखनी से लिपिबद्व किया। उनके लिखे जाने का अर्थ यही होता था कि सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा। पत्रकारिता के साथ साथ वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुडे रहे! अनेक किस्म की जिम्मेदारियों का निर्वहन किया किन्तु पद के फेर में कभी नहीं रहे। शायद यही कारण है कि वे संघ के साथ साथ अन्य राजनीतिक दलों में भी सम्मान पाते रहे। पत्रकार रामशंकर अग्निहोत्री पर उम्र हमेशा से बेअसर रही और यही कारण है कि जब लोग इस उम्र में आकर आराम करना चाहते हैं तब भी वे सक्रिय रहे। आखिरी दिनों में भी उनकी सक्रियता नौजवान पीढ़ी के लिये मिसाल बनी रही। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि·ाविद्यालय रायपुर में स्थापित मानव अध्ययन शोधपीठ के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे। उनकी सृजन क्षमता अद्वितीय थी। उनकी लिखी किताबें कश्मीर के मोर्चे पर, राष्ट्रजीवन की दिशा, बाजी प्रभु देशपांडे, सुरक्षा के मोर्चे पर, अविस्मरणीस बाबा साहेब आप्टे, कम्युनिस्ट वि·ाासघात की कहानी, डॉ. हेगडेवार : एक चमत्कार और नया मसीहा की चर्चा होती रही। अग्निहोत्रीजी संवेदनशील व्यक्ति थे और उनकी संवेदना कविताओं में झरती थी। उनकी कृति सत्यम एकमेव उनकी संवेदना और राष्ट्र के प्रति अनुराग की बानगी है। पद और सम्मान से हमेशा खुद को अलग रखने वाले अग्निहोत्रीजी को उनके चाहने वाले हमेशा सम्मानित करने में आगे रहे। मध्यप्रदेश शासन के अखिल भारतीय माणिकचंद्र वाजपेयी पत्रकारिता पुरस्कार २००८ के अलावा इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती का डॉ. नगेन्द्र पुरस्कार, राष्ट्रीय पत्रकारिता कल्याण न्यास का स्वर्गीय बापूराव लेले स्मृति पत्रकारिता पुरस्कार तथा सप्रे संग्रहालय भोपाल का लाला बलदेवसिंह सम्मान प्रमुख हैं। ७ जुलाई २०१० का वह दिन हर साल उनकी याद दिलाता रहेगा। अग्निहोत्रीजी का ऐसे समय में चले जाना पत्रकारिता और समाज दोनों के लिये एक ऐसे स्थान का रिक्त हो जाना है जिसकी पूर्ति शायद ही कभी हो। वे नवोदित पत्रकारों के लिये पाठशाला थे तो राजनीति करने वालों के लिये शिक्षक। उनकी महत्ता इसी बात से जाहिर होती है जब के. सुदर्शन ने सार्वजनिक सभा में यह बात स्वीकार किया था कि आज वे जो कुछ हैं, अग्निहोत्रीजी के मार्गदर्शन के कारण हैं। यह ठीक है कि अग्निहोत्रीजी हमारे बीच नहीं रहे किन्तु उन्होंने जो रास्ता तय किया था, उस रास्ते पर चलने की, उनके आदर्शाें को आगे बढ़ाने की जवाबदारी समाज की है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं।)

Tuesday, July 6, 2010

wah sarkar

आम आदमी को महंगाई की मार, मंत्रियों को नयी कार
भाजपा हाइकमान एक तरफ ऐलान कर रहे हैं कि उनकी पार्टी महंगाई के खिलाफ अब हर रोज केन्द्र सरकार से दो दो हाथ करेगी। उनका मकसद साफ है। वे जनता को राहत दिलाना चाहते हैं और इसी मकसद को लेकर दो दिन पहले देशव्यापाी बंद का आयोजन किया गया था। जनता को राहत मिली हो या न मिली हो, भाजपा और उसके साथी दलों को जरूर आम आदमी का भरोसा मिला। इस भरोसे को आगे ले जाते इसके पहले मध्यप्रदेश की जनता को जोर का झटका बहुत जोर से लगा जब अखबारों में खबरें आयी कि प्रदेश सरकार अपने मंत्रियों को नयी गाड़ी और नये बंगले देगी। यही नहीं, स्टेट गैरेज से दो चालक भी दिये जाएंगे। सरकार के इस फैसले का अर्थ तो सरकार जानें लेकिन आम आदमी का निराश होना स्वाभाविक है।
जो नेता कल महंगाई को लेकर हल्ला मचा रहे थे, अब वही नेता नयी गाड़ियों में घूमेंगे। नये बंगलों में रहेंगे और आम आदमी दो जून की रोटी के लिये मर मर कर जीता रहेगा। सरकार अपने मंत्रियों को यह सुविधाएं पहली बार नहीं दे रही है और न ही सुविधाभोगी मंत्रियों की यह पहली बार सूची है। पूर्ववर्ती सरकारों के जमाने में भी ऐसा और कहीं इससे ज्यादा होता रहा है। फैसले का यह वक्त गलत तय किया गया। आज जब महंगाई के लिये जनता के हक में राजनीतिक दल सड़कों पर उतर रहे हैं, तब ऐसी घोषणा आम आदमी को रूला देती है। इसी सरकार के मंत्री गोपाल भार्गव के पहल की तारीफ की जानी चाहिए जिन्होंने मंत्रालय का काम मंत्रालय में करने की नीति के तहत बंगले से आफिस को बंद कर दिया। इससे न केवल काम में सुविधा होगी बल्कि दोहरे स्टेबलिसमेंट का खर्च बच सकेगा। मंत्री भी आखिर एक सामाजिक प्राणी हैं और उनकी निजता भी होती है किन्तु बंगले में कार्यालय होने से मंत्री की निजता पर बाधा होती है।
हमारी अपेक्षा है कि बाकि मंत्री भी गोपाल भार्गव के नक्शेकदम पर चलकर कुछ मॉडल पेश करें। गोपाल भार्गव से भी हमारी अपेक्षा है कि सरकार के ताजा फैसले को वे अपने ऊपर लागू होने से खुद को बचायें एवं दूसरों को भी ऐसा करने के लिये प्रेरित करें। इससे न केवल नेताओं का आदर्श आम आदमी के सामने प्रस्तुत होगा बल्कि सरकार की छवि भी आम आदमी में अच्छी बन सकेगी।

Monday, July 5, 2010

Netaji ki jay

महंगाई की चिंता मे घुलते राजनेता

मनोज कुमार

महंगाई की आग केन्द्र सरकार की लगायी हुई है तो उसमें घी डालने का काम विपक्षी राजनीतिक दलों ने किया है। महंगाई की मार से जूझते आम आदमी को रोज रोज किलकिल करना पड़ रही है। एक एक खर्चे में कटौती करनी होती है तब कहीं जाकर घर का खर्च चल पाता है। ऐसे में विपक्षी राजनीतिक दलों ने महंगाई के विरोध में एक पूरा दिन काम धाम चौपट कर दिया। महंगाई का विरोध किया जाना चाहिए किन्तु यह ढंग महंगाई को नियंत्रित करने के बजाय बढ़ाती ही है। मीडिया ने इस बंद के परिप्रेक्ष्य में व्यापक पड़ताल की तो कई जगहों से खबरें आयी कि अनेक घरो में चूल्हे नहीं जले। जले भी तो कहां से? दिहाड़ी मजदूरों को मजदूरी नहीं मिली तो राशन का इंतजाम कहां से हो और जब राशन का इंतजाम नहीं होगा तो चूल्हे कैसे जलेंगे। महंगाई बढ़ाने वाले और उसका विरोध करने वाला कोई नेता यह तो बताये कि उसके घर में कब चूल्हा नहीं जला। एसी कमरे और एसी कार में बैठकर बातें करना आसान है लेकिन रोज रोज मर कर जीते लोगों की तकलीफ का अंदाजा इनमें से किसी को नहीं है। संसद और विधानसभा सरकार नीतियों और कामों की आलोचना करने, विरोध करने के लिये बना है फिर देश का उत्पादन प्रभावित करने की जरूरत क्या और क्यों है? भारी भरकम बजट से चलने वाले इन सदनों में आम आदमी की बात रखने के लिये ही तो जनप्रतिनिधियों का चयन किया जाता है फिर भला उन्हें सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों है। एकबारगी मान भी लें कि ऐसा करके वे सरकार पर दबाव बनाना चाहते हैं तो कोई ये बताये कि किस चीज की कीमत सस्ती हुई है। मैं अर्थशास्त्री तो नहीं हूं लेकिन एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि एक दिन के बंद से जो आर्थिक नुकसान हुआ है, उसकी क्षतिपूर्ति के लिये फिर कीमतों में बढ़ोत्तरी कर दी जाएंगी। विरोध का तरीका यह ठीक नहीं है। जापान में विरोध होता है तो आम आदमी को और अधिक काम करना होता है और हमारे यहां विरोध का मतलब काम ठप करना है। लाखों करोड़ों रुपये राजस्व की जो हानि हुई है, उसे कौन भरेगा। राजनीतिक दलों को आम आदमी की इतनी ही चिंता है तो अपने वेतन भत्ते को लेने से इंकार कर देना चाहिए किन्तु इस मामले में सब दल एक हैं। अभी चर्चा सांसदों के वेतन भत्ते बढ़ाने की चल रही है और इस मामले में सब दल एकजुट हैं। दशमल शून्य प्रतिशत राजनेताओं को छोड़ दें तो लगभग सभी नेता मालदार हैं और उन्हें वेतन भत्ते की जरूरत नहीं है। मेरा मानना है कि आम आदमी को इन नेताओं के वेतन भत्ते के खिलाफ रोष जाहिर करना चाहिए। महंगाई की चिंता मे घुलते राजनेता कभी इस पर विचार करेंगे, ऐसे वक्त का देश की जनता को इंतजार रहेगा।

Friday, July 2, 2010

coldrink

कोलड्रिंक्स में अब उफान क्यों नहीं
मनोज कुमार
आज आइसक्रीम पार्लर पर जाकर मैंने कोक की मांग की और सधे हाथों से लगभग छह माह या इससे ज्यादा पहले जो बारह रुपये भुगतान करता था, वह करने लगा तो दुकानदार लगभग मुझे चिढ़ाते हुए कहा कि पन्द्रह रूप्ये लगेंगे। इस बारे में मेरा हर सवाल बेकार था क्योंकि दुकानदार को इससे कोई वास्ता नहीं। इसे संयोग ही कहेंगे कि जब मैं कोक और सुनीता नारायणनन के बारे में सोच रहा था तभी मेरी नजर एक आर्टिकलनुमा खबर पर पढ़ी जिसमें साफ्टडिंªक्स से होेने वाले मानव एवं धरती के नुकसान के बारे में तफसील से बयान किया गया था। यह महज संयोग ही था कि मैं और वह एक किताब एक ही प्लेटफार्म पर खड़े थे। सुनीता नारायणन ने कभी कोलड्रिंक्स में अब उफान पैदा कर दिया था। ठंडे पेय पदार्थ में इतनी गर्मी आ गयी थी कि लोग इसे पीने से परहेज करने लगे थे लेकिन जैसा होता आया है वैसा ही एक बार दोहराया गया और समय गुजरने के साथ साथ यह उफान ठंडा पड़ता गया। लोग भूलने लगे कि इसके पीने से क्या बीमारी होगी और हमारी धरती माता का कोख कैसे आहिस्ता आहिस्ता खोखला होता जा रहा है। एक बार चर्चा इसलिये शुरू हो रही है कि अभी इस विषय पर एक किताब आयी है। बहुत थोड़े से अखबार और पत्रिकाओं ने गौर किया है और इसमें प्रकाशित सामग्री को आम पाठक तक पहुंचाने का प्रयास किया है। तय बात है िकइस सामग्री का बहुत प्रभाव तब तक नहीं पड़ेगा जब तक कि मीडिया आक्रामक न हो जाए। सुनीता नारायणन ने जब मोर्चा खोला था तब मीडिया का तेवर भी आक्रामक था।
समय गुजरने के साथ साथ कोक और पेप्सी का मुद्दा परिदृश्य में चला गया। एक समय था जब मीडिया ने आक्रामक तेवर दिखाये तो इन पेय पदार्थों की कीमतों में अचानक गिरावट आ गयी। कहना न होगा कि कंपनी को उसके लाभ के प्रतिशत में भारी गिरावट दिखी लेकिन नुकसान हुआ होगा, यह कहना मुश्किल है। समय के साथ मामला ठंडा पड़ता गया और इन पेय पदार्थों का बाजार वापस गर्माता गया। चुपके से कब दामों में वृद्वि कर दी गई, किसी को खबर नहीं हुई। इन कंपनियों का फार्मूला बहुत अचूक होता है जब एक रूप्ये कीमत कम करते हैं तो लाखो रूप्ये के विज्ञापन देकर एक एक उपभोक्ता को पकड़ पकड़ कर बताने का प्रयास करते हैं किन्तु जब तीन रूप्ये कीमत बढ़ाते हैं तो किसी को खबर नहीं होने देते। आज इन पेय पदार्थों का मार्केट उछाल पर है और इसे पीने वाले हिन्दुस्तानी की तबीयत उतार पर। पर्यावरण को होने वाले नुकसान की तो पूछिये मत।
सवाल यह है कि एक सुनीता नारायणनन ने सामाजिक सरोकार के मुद्दे को आगे बढ़ाया। सब लोगों ने उनके फेवर में बात की। कहा बिलकुल ठीक है। तो फिर ऐसा क्या हो गया कि इसके बाद आगे कोई क्यों नहीं आया? एकदम से खामोशी क्यों छा गयी? क्यों अब इन पेय पदार्थों से होने वाले नुकसान के बारे में मीडिया फोरम में बातचीत नहीं हो रही है? स्कूलों में बच्चों को जो ताकीद दी जा रही थी, अचानक उस विषय को क्यों गायब कर दिया गया? हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिये हम आजादी के साठ साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी लड़ रहे हैं तो पेप्सी और कोक की विदाई करने के लिये हम क्यों पीछे हट रहे हैं? इनके खिलाफ हमारी लड़ाई तेज क्यों नहीं हो रही है। शायद मामला राजस्व का है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की लड़ाई मंे सरकार के खजाने को कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा है लेकिन इनके खिलाफ कार्यवाही से कुछ तो नुकसान होगा। शराब और तंबाकू पर इसलिये ही अब तक प्रतिबंध नहीं लग पाया है क्योंकि सबसे ज्यादा राजस्व इनसे ही मिलता है। मीडिया को एक बार फिर इस मुद्दे पर आक्रामक होना होगा क्योंकि यह मामला सेहत का है।

Wednesday, June 30, 2010

पोस्ट कार्ड का जन्म दिन

पोस्टकार्ड का जन्मदिन और गुम होते संपादक के नाम पत्र
मनोज कुमार

आज महज संयोग है कि जब मैं संपादक के नाम पत्र और पोस्टकार्ड की महत्ता पर लेख लिखने बैठा तभी पता चला कि आज एक जुलाई को पोस्टकार्ड का न केवल जन्म हुआ था बल्कि उसने अपने जन्म के सौ साल पूरे कर लिये हैं। पोस्टकार्ड हर आदमी के जीवन में बहुत मायने रखता है उसी तरह जिस तरह आज हर जेब के लिये मोबाइल फोन जरूरी हो गया है। इंटरनेट के बिना हमारा काम ही नहीं चलता है और टेलीविजन तो जैसे सांस लेने के लिये जरूरी है। इन आधुनिक तकनीकों के बावजूद पोस्टकार्ड की जरूरत कभी खत्म ही नहीं हुई। इस छोटे से कार्ड को खरीदने के लिये इस महंगाई के दौर में भी मात्र पचास पैसे खर्च करने होते हैं और इस पर कोई बिजली का खर्च नहीं होता है और न ही इसके लिये कोई कम्प्यूटर जैसी चीज की जरूरत होती है। मुझे लगता है कि पत्रकारिता में पोस्टकार्ड एक प्राथमिक कक्षा की तरह ही है जहां भावी पत्रकार अपना पहला सबक सीखते हैं। आइए इस पर थोड़ा विस्तार से बात करें।
अजय शर्मा मेरे दोस्त हैं । इन दिनों एनडीटीवी में समाचार संपादक के पद पर तैनात हैं। अपने आरंभिक दिनों में हम दोनों देशबन्धु के लिये लिखते थे। वे ग्वालियर से खबरें भेजा करते थे और मैं पहले रायपुर और बाद में भोपाल में देशबन्धु मंे बतौर उपसंपादक उन्हें एडिट किया करता था। मैं दैनिक देशबन्धु से भोपाल से निकल रहे साप्ताहिक देशबन्धु में आया था। यहीं हम दोनों की मित्रता हुई। लगभग पन्द्रह बरस से ज्यादा हो गये हमारी पहचान और दोस्ती को। एक दिन मैंने उनसे आग्रह किया कि समागम के लियेे अपनी लिखी पहली खबर की यादों को तफसील से लिखें। उन्होंने मेरे आग्रह को तो माना ही बल्कि जो लिखा, उसने मुझे एकबारगी पत्रकारिता के बरक्स कुछ और सोचने का विषय दे दिया। उन्होंने अपनी यादों में लिखा कि उनके द्वारा लिखा गया संपादक के नाम पत्र कैसे नईदुनिया में प्रकाशित हुआ और उस पत्र के कारण वे अपने शहर में अलग से पहचाने गये। यही नहीं, पत्र में लिखी गयी समस्या का भी तत्काल निदान हो गया। मैंने भी अपने आरंभिक दिनों में संपादक के नाम पत्र लिखा करता था। कभी एक कॉलम में तो कभी दो कॉलम में और कभी बहुत ही संपादित कर प्रकाशित हुआ करता था। इन प्रकाशित पत्रों को सम्हाल कर ऐसे रखते थे मानो किसी बैंक की पासबुक हो। संपादक के नाम पत्र लिखने की आदत बाद के सालों में भी बनी रही और कुछ पत्रिकाआंेे के
लेख/रिपोर्ताज पर अपनी प्रतिक्रिया छपने के लिये भेजता रहा। मजा तो यह था कि पत्रकारिता के कई साल गुजर जाने के बाद भी संपादक के नाम पत्र में अपना छपा नाम देखकर वही आनंद मिलता था, जो पत्रकारिता के आरंभिक दिनों में मिलता था।
खैर, मुद्दे की बात पर आता हूं। अजय ने जब संपादक के नाम पत्र का उल्लेख किया तो मैं अखबारांे और पत्रिकाओं में तलाश करता रहा लेकिन काफी अध्ययन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अब संपादक के नाम पत्र भेजने में किसी की दिलचस्पी नहीं रही। पाठक अखबारों से लगातार दूर होेते गये और उनकी प्रतिक्रिया के अभाव में पाठक और अखबार के बीच दूरी बनती जा रही है। किसी भी प्रकार का कार्य किया जाए उस पर प्रतिक्रिया आना जरूरी होता है और यही प्रतिक्रिया बताती है कि हम कितने सफल या असफल हैं और समाज हमारे बारे में क्या सोचता है। पत्रकारिता के लिये तो यह और भी जरूरी हो जाता है कि आखिर हमारे लिखेे का समाज पर क्या असर हो रहा है और लोग हमारी लिखी चीजों को गंभीरता स ेले रहे हैं या नहीं, आदि-इत्यादि बातों का पता चलता है। एक समय था जब प्रतिक्रिया में सैकड़ों की तादात में पत्र आ जाते थे। चूंकि पोस्टकार्ड का आकार छोटा होता है इसलिये इसमें लिखी गयी बातें भी सारगर्भित होती थी। थोड़े शब्दों में अधिक लिखा जाता था। संभवतः मेरे समकालीन पत्रकारों को ज्ञात होगा कि संपादक के नाम पत्र में छपी समस्या अथवा किसी मुद्दे को उभारे जाने पर शासन प्रशासन में न केवल प्रतिक्रिया होती थी। अजय शर्मा का संपादक के नाम लिखे गये पत्र में उन्होंने इसी किस्म की बात को याद किया है।
आधुनिक समय में समय और स्थान की कमी होती जा रही है तब पोस्टकार्ड और भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह केवल प्रतिक्रिया लिखने के लिये नहीं बल्कि उन नवोदित पत्रकारों को यह सीखने के लिये कि एक छोटे से पोस्टकार्ड में हम अपनी बात कितने प्रभावी ढंग से लिख सकते हैं। मैं जब कभी मीडिया के विद्यार्थियों के बीच जाता हूं तो पोस्टकार्ड ले जाना नहीं भूलता। उन्हें इसे पत्रकारिता की प्राथमिक कक्षा के रूप् में संबोधित करते हुए इसके महत्व को बताता हंू। ई-मेल और मोबाइल के जरिये बात हो रही है, एक्शन-रिएक्शन लिये दिये जा रहे हैं लेकिन इनका दस्तावेजीकरण नहीं हो पा रहा है। पोस्टकार्ड एक प्रकार का दस्तावेज हुआ करता था। पोस्टकार्ड के लिये बिजली की भी जरूरत नहीं है। एक रुपये के पेन से भी काम चल जाता है। आज पोस्टकार्ड के जन्मदिन पर पत्रकारिता में इसके महत्व को आंकने की जरूरत है।

मीडिया और महिलाये


लीडरशीप की नयी परिभाषा गढ़ती ग्रामीण महिलाएं

मनोज कुमार

ध्यप्रदेश में पंचायतीराज के डेढ़ दशक बाद महिला लीडर अब पूरी तरह से चुनौतियों का सामना करने के लिये तैयार दिख रही है। अनेक किस्म की दिक्कतों के बीच वे अपने लिये राह बना रही हैं। सत्ता पाने के बाद उन्हें सरूर (सत्ता का नशा) नहीं हुआ बल्कि सत्ता से वे सत (सच) का रास्ता बना रही हैं। यह स्थिति राज्य के दूरदराज झाबुआ से लेकर मंडला तक के ग्राम मपंचायतों में है तो राजधानी भोपाल के आसपास स्थित गांवों की महिला लीडरों का काम अद्भुत है। ये महिलाएं कभी चुनौतियों को देखकर घबरा जाती थीं तो अब चुनौतियों का सामना करने के लिये ये तैयार दिख रही हैं। पंचायतीराज का पूरा का पूरा परिदृश्य बदला बदला दिखायी देने लगा है। कभी गांवों में महिलाओं के नाम पर पुरूषों की सत्ता हुआ करती थी और परिवार वालों का दखल था, अब वहां सिर्फ और सिर्फ महिलाआंे का राज है। वे चुनी जाती हैं, राज करती हैं और समस्याआंे से जूझती हुई गांव के विकास का रास्ता तय करती हैं। किरण बाई आदिवासी महिला है। वह तेंदूखेड़ा में रहती है। इस बार के चुनाव में वह बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष चुनी गयीं। तेंदूखेड़ा और बाबई चिचली के बीच की दूरी लगभग तेरह किलोमीटर है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते उन्हें नियमानुसार वाहन की सुविधा मिलनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। जनपद अध्यक्ष होने के नाते किरण बाई ने जनपद पंचायत के सीईओ से इसी साल 2010 के अप्रेल महीने में वाहन देने का अनुरोध किया तो उन्हें किराये पर वाहन लेने की अनुमति दी गई। किरण बाई को लगा कि उनकी मुसीबत खत्म हो गई और वे अपने काम को इत्मीनान के साथ पूरा कर सकेंगी लेकिन उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि अभी उनकी मुसीबत खत्म नहींं हुई है। सीईओ के आदेश पर वाहन किराये पर लिया और अपना काम निपटाने निकल पड़ी। महीना खत्म होते होते जब किरणबाई ने भुगतान के लिये बिल प्रस्तुत किया तो उसे किनारे कर दिया गया और कहा गया कि अभी राशि नहीं है। जनपद अध्यक्ष के लिये अब दोहरी मुसीबत है। पहले तो गाड़ी नहीं थी, अब उधारी उनके मत्थे चढ़ गयी है। सीईओ कहते हैं कि उनके पास ही गाड़ी नहीं है तो जनपद अध्यक्ष को कहां से गाड़ी की सुविधा दें लेकिन पंचायत कानून में साफतौर पर प्रावधान है कि जनपद अध्यक्ष को वाहन सुविधा उपलब्ध करायी जाए। बाबई चिचली जनपद की अध्यक्ष किरण बाई के हौसले को सीईओ की इस बेरूखी से कोई फर्क नहीं पड़ा। वह अपने पति के साथ रोज तेरह किलोमीटर का सफर सायकल से तय कर जनपद मुख्यालय जाती हैं। दिन भर काम निपटाने के बाद वह वापस अपने पति के साथ घर लौट आती हैं। अपने जीवनसाथी के इस सहयोग से जहां किरण बाई के हौसलों को नयी ऊंचाई मिली है। किरणबाई एक मिसाल है उन महिलाओं के लिये जो सुविधाओं के अभाव में अपना काम नहीं कर पाती हैं या दिक्कतों का रोना रोते हुए समय गंवा देती हैं। किरणबाई सुविधा नहीं मिलने से दुखी हैं लेकिन निराश नहीं। वे अपना दायित्व समझती हैं और उसे पूरा करने के लिये आगे आ रही हैं। किरणबाई राज्य की पंचायतों की अकेली लीडर नहीं है बल्कि ऐसे अनेक गुमनाम महिला लीडर हैं जो इसी साहस और ताकत के साथ सत्ता की बागडोर सम्हाले हुए हैं। इन महिला लीडरों को समाज सलाम करता है। मध्यप्रदेश में स्त्री ग्रामीण सत्ता के प्रति पुरूषों में भी भाव बदला है। अब उन्हांेंने किनारा कर लिया है और इसका प्रमाण यह है कि राज्य के अनेक पंचायतों में सौफीसदी सत्ता महिलाओं की बन गयी है। पचास फीसदी आरक्षण के कारण और पचास फीसदी स्वयं पुरूषों द्वारा सत्ता छोड़ने के कारण। हालांकि अभी इसका प्रतिशत कम है लेकिन उम्मीद की एक किरण जागी है। महिला लीडरों के लिये चुनौतियां कम नहीं हुई है। अनेक ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां पंचायतोंे में महिला लीडरों को उनके बुनियादी अधिकार एवं सुविधाओं से वंचित रखा गया है। नियमों का हवाला, आर्थिक तंगी और अपरोक्ष रूप महिला लीडर को परेशान करने की मंशा के चलते रोज नयी चुनौतियां दी जा रही हैं। इन चुनौतियों से महिला लीडर परेशान होने के बजाय रोज नयी इबारत लिख रही हैं।

Saturday, June 26, 2010

paetish saal bad

कहां से चले थे और कहां पहुंच गए हम
मनोज कुमार
पैंतीस बरस बाद जब हम भारतीय इतिहास के आपातकाल के उन दिनों को याद करते हैं तो मन एक बार फिर कसैला हो जाता है किन्तु साथ ही गर्व करते हैं कि तत्कालीन सरकार के इस तानाशाही रवैये का हिन्दी पत्रकारिता ने पुरजोर विरोध किया था। जैसा कि होता है आपातकाल के दरम्यान सबसे पहला प्रहार पत्रकारिता पर ही हुआ था। अखबारों के दफ्तरों में पहरा बिठा दिया गया था। अखबार छपने के पहले सरकारी नुमाइंदे उसे पढ़ते, जांचते और फिर छपने के लिये दिया जाता था। अखबारों की यह मजबूरी थी किन्तु इस मजबूरी के चलते हथियार नहीं डाला गया बल्कि पूरी ताकत के साथ लड़ा गया। यह वह समय था जब अखबारों की तादाद कम थी लेकिन जो भी थे, प्रभावशाली। एक एक शब्द हथौड़ी की तरह चोट कर जाता था। समाज अखबार में छपी खबरों को गंभीरता से लेता था। समय गुजरता गया। साल दर साल आपातकाल की बात पुरानी होती गयी। नयी पीढ़ी को तो बहुत कुछ पता ही नहीं। इस बीच पत्रकारिता से मीडिया का स्वरूप बन गया और वह दिन ब दिन विस्तार पा रहा है। आकाशीय चैनलों की धूम है और अखबारों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है।
खैर, इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है कि पत्रकारिता इतिहास रचती है। आपातकाल का पुरजोर विरोध कर पत्रकारिता ने यह जता दिया था। जिस पत्रकारिता ने अंग्रेजों को भारत से निकाल बाहर किया था, उसमें इतनी ताकत बची है कि वह बार बार और हर बार ऐसे तानशाह को मुंहतोड़ जवाब दिया। इस बार जब आपातकाल के पैंतीस बरस हुए तो अखबारों में विशेष सामग्री दी गई। यह एक कोशिश थी जिसे अच्छा ही कहा जाएगा। इतिहास से बेखबर पीढ़ी को आपातकाल के बारे में जानने और समझने का अवसर मिला है। आपातकाल की जो गूंज थी, इन पैंतीस सालों में वह धीमी पड़ गयी है तो पत्रकारिता के तेवर भी बदले हुए हैं। पैंतीस बरस पहले शायद पत्रकारिता को लेकर कभी कोई सवाल या संशय की स्थिति नहीं बनी। अखबार यानि सच और सच का मतलब सिर्फ सच हुआ करता था किन्तु इन सालों में इस सच का मतलब बदलता हुआ दिख रहा है। समाज का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर कभी आंच नहीं आयी और ऐसा होता तो शायद न कभी अंग्रेज भारत छोड़ कर जा पाते और न ही आपातकाल का अंत हो पाता लेकिन आज ऐसा हो रहा है।
पत्रकारिता को लेकर सवाल पर सवाल दागे जा रहे हैं। पत्रकारिता की वि·ासनीयता कटघरे में है। अवि·ाास के इस दौर में पत्रकारिता को विस्तार भी मिला है किन्तु एक उत्पाद के रूप में। पैंतीस बरस पहले भी अखबार व्यवसायिक थे और इसके लिये एक पन्ना तय होता था जिसमें व्यापार की खबरें छपा करती थी किन्तु अब एकाध पन्ने को छोड़कर पूरा अखबार व्यापार करने लगा है और इसी के साथ खबरों की वि·ासनीयता घटने लगी है। कंटेंट को लेकर अब अखबारों में कोई चिंता नहीं दिखती है बल्कि कलेवर को लेकर चिंता ज्यादा है। सामाजिक सरोकार की खबरें हाशिये पर है और लाइफस्टाइ, फैशन के लिये पूरा पूरा पन्ना छापा जा रहा है। पैंतीस साल के इस सफर में हिन्दी पत्रकारिता की उपलब्धि यह रही कि अंग्रेजी के अखबारों और पत्रिकाओं को हिन्दी में आना पड़ा लेकिन यह उपलब्धि सही मायने में बाजार की मानी जानी चाहिए क्योंकि हिन्दी का बाजार बड़ा है। इस बात को अंग्रेजी प्रबंधन ने खूब जाना और वे हिन्दी पर अहसान थोपते हुए हिन्दी बाजार में आ गये। अपने आने के साथ साथ वे पत्रकारिता के साथ बाजार का व्यवहार करने लगे। अखबारों में उपहारों की बरसात होने लगी। बस वैसे ही जैसे बाजार में उपलब्ध अन्य उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिये कोई कारोबारी करता है। उपहार स्कीम ने भी अखबारों की प्रतिष्ठा एवं प्रभाव को कम किया है क्योंकि जिन अखबारों को उसके कंटेंट के लिये सम्हाल कर रखा जाता था, आज वही अखबार सहेजे जा रहे हैं उपहार पाने के लिये कूपन बटोरेने के खातिर।
इन सालों में हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार होता गया। हर बड़े कारोबारी घराने को यह सुहाने लगा कि वह भी अपना एक अखबार या पत्रिका निकाल ले। कुछ इस कोशिश में सफल भी हुए तो अधिकांश केवल ढो रहे हैं। अखबारों के नाम भी विचित्र से रखे जाने लगे हैं। कुछ सुझा नहीं तो अपनी ही संस्था के नाम के आगे पीछे कुछ जोड़जाड़ कर आरंभ कर दिया। मोटी तनख्वाह देकर कुछ दक्ष पत्रकारों को साथ ले लिया और बाकि का स्टाफ नौसिखियों से भर लिया गया। कंटेंट का तो इन अखबारों में कोई सवाल ही नहीं था। साधन की कमी नहीं थी सो कारोबारियों के अखबार साध्य में लग गये। राजनीति और प्रशासन में अखबार के जरिये पहुंच और पकड़ बनाने लगे। जिन्हें कभी अपने कारोबार के काम को सहज बनाने के लिये भेंट देना होती थी, उसमें उन्हें पूरी तरह छूट या रियायत मिलने लगी। उनके अखबार निकालने का मकसद यही था और यह पूरा होने लगा।
आपातकाल में अखबार कहर ढा रहे थे, आज वही अखबारों पेडन्यूज के मामले में विवादों के घेरे में है। जांच चल रही है, बातें हो रही है, चेतावनी मिल रही है और नजरें भी रखी जा रही हैं। कितने दुर्भाग्य की बात कि कल जो पत्रकारिता समाज के विरोधियों पर नजरें रखती थी, आज उस पर दूसरों की नजरें हैं। पैसे लेकर खबर छापने के कारण पत्रकारिता की वि·ासनीयता पर भी आंच आयी है। पैंतीस बरस बाद इतिहास के काले पन्ने को याद कर हम सिहर उठते हैं लेकिन आज जो पत्रकारिता के हालात हैं, वह भी सिहरन पैदा करती है। इन पैंतीस सालों में हिन्दी पत्रकारिता में सम्पादक नाम की संस्था का लोप होता जा रहा है। मालिक स्वयं सम्पादक बन बैठे हैं और कानूनी बाध्यता झेलने के लिये एक कार्यकारी सम्पादक बिठा दिया जाता है। यह बदलाव भी पीड़ादायक है।
इन पैंतीस सालों में मंझोले किस्म के कस्बाई अखबार जरूर उम्मीद की रोशनी जगाते हैं। बड़े समाचार समूहों के मल्टीएडीशन अखबारों के चलते एक शहर की खबर दूसरे शहर में नहीं पहुंच पा रही है किन्तु सीमित संसाधनों में निकलने वाले अखबार इस कमी को पूरा कर रहे हैं। उनके पास आम आदमी की पीड़ा छापने के लिये अभी जगह बाकि है क्योंकि उन्हें मल्टीनेशनल कंपनी के लुभावने विज्ञापन नहीं मिल पा रहे हैं। पैंतीस बरस की हिन्दी पत्रकारिता नाउम्मीद ही करती है। हालांकि इस बात से सहमत नहीं हुआ जा सकता है कि हिन्दी पत्रकारिता में घटाघोप अंधेरा छा गया है।